Lord Shanidev ब्रह्मांड का वो इकलौता बालक, जिससे हार मान गए थे शनिदेव! और शनिदेव को मांगनी पड़ी प्राणों की भीख!
जानिए कैसे एक बालक की तपस्या ने बदल दिया न्याय के देवता का विधान और क्यों पीपल बना शनि का रक्षक?

Lord Shanidev पिता दधीचि का त्याग और पुत्र पिप्पलाद का संघर्ष: एक ऐसी कथा जो पीपल पूजा के महत्व को प्रमाणित करती है।
भारतीय पौराणिक इतिहास में कई ऐसी कथाएं हैं जो हमें जीवन के गहरे रहस्य समझाती हैं। इन्हीं में से एक कथा है महर्षि दधीचि के पुत्र पिप्पलाद की। यह कथा बताती है कि क्यों आज भी शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से मुक्ति के लिए लोग पीपल के वृक्ष की शरण में जाते हैं और क्यों स्वयं न्याय के देवता शनि, पीपल के नाम से ही कांप उठते हैं।

1. एक महान पिता का त्याग और अनाथ बालक का कष्ट
कथा का आरंभ होता है महर्षि दधीचि के उस महाबलिदान से, जिन्होंने देवताओं और धर्म की रक्षा के लिए अपनी अस्थियां दान कर दी थीं। उनके इस बलिदान से बने ‘वज्र’ से इंद्र ने वृत्रासुर का वध किया। लेकिन इस महान त्याग की एक दूसरी और दुखद कड़ी भी थी। दधीचि के देह त्यागने के बाद उनकी पत्नी सुवर्चा ने भी पति-वियोग में सती होने का निर्णय लिया।उस समय सुवर्चा के गर्भ में एक बालक था। अपने सती होने से पूर्व उन्होंने उस बालक को जन्म दिया और उसे एक पीपल (पिप्पल) के वृक्ष के कोटर (खोखले तने) में रख दिया। वह अबोध बालक जंगल में अकेला रह गया। न उसके पास माँ की ममता थी, न पिता का साया।
2. पीपल के पत्तों से मिला जीवन: ‘पिप्पलाद’ का उदय
उस अनाथ बालक ने पीपल के गिरे हुए पत्तों और उसके फलों (गूलर) को खाकर अपनी भूख मिटाई। पीपल के वृक्ष ने ही उसे धूप, वर्षा और जंगली जानवरों से सुरक्षा प्रदान की। सालों तक पीपल के साये में पलने और उसी के फल खाकर जीवित रहने के कारण ही उस बालक का नाम ‘पिप्पलाद’ पड़ा। पिप्पलाद का अर्थ है— ‘वह जो पीपल के पत्तों पर जीवित रहा’।


3. नारद जी का आगमन और सत्य का बोध
समय बीतता गया और पिप्पलाद एक तेजस्वी किशोर बन गए। एक दिन देवर्षि नारद उस वन से गुजरे। पिप्पलाद के मुख पर ब्रह्मतेज देखकर वे रुक गए। पिप्पलाद ने उनसे अपने माता-पिता के बारे में पूछा। तब नारद जी ने बताया, “पुत्र, तुम्हारे पिता महर्षि दधीचि परम बलिदानी थे। लेकिन तुम्हारी इस दुर्दशा और तुम्हारे परिवार के विनाश का मुख्य कारण शनिदेव की क्रूर दृष्टि है। जब तुम्हारा जन्म हुआ, तब तुम पर शनि की महादशा चल रही थी, जिसके कारण तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा।”यह सुनते ही पिप्पलाद की आँखों में प्रतिशोध की ज्वाला जल उठी। उन्होंने संकल्प लिया कि वह शनिदेव को उनके इस अन्यायपूर्ण व्यवहार का दंड अवश्य देंगे।

4. ब्रह्मा जी की तपस्या और ब्रह्मदण्ड की प्राप्ति
पिप्पलाद ने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या शुरू की। उनकी तपस्या इतनी भीषण थी कि तीनों लोक थर्राने लगे। प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा। पिप्पलाद ने कहा, “प्रभु, मुझे ऐसी शक्ति दीजिए कि मेरी दृष्टि जिस पर भी पड़े, वह भस्म हो जाए।” ब्रह्मा जी ने ‘एवमस्तु’ कहकर उन्हें वह दिव्य शक्ति प्रदान कर दी।
5. जब शनिदेव जलने लगे: पिप्पलाद का प्रतिशोध
वरदान पाते ही पिप्पलाद ने शनिदेव का आह्वान किया। जैसे ही शनिदेव उनके सामने प्रकट हुए, पिप्पलाद ने अपनी क्रोधाग्नि से भरी दृष्टि उन पर डाल दी। देखते ही देखते शनिदेव का शरीर जलने लगा। वे अपनी रक्षा के लिए ब्रह्मांड में इधर-उधर भागने लगे, लेकिन पिप्पलाद की दृष्टि का प्रभाव कम नहीं हुआ।शनिदेव के शरीर का रंग जलकर काला पड़ गया और वे असहनीय पीड़ा से चीखने लगे। अंततः जब शनिदेव के प्राण संकट में पड़ गए, तब स्वयं ब्रह्मा जी को बीच-बचाव करने आना पड़ा।
6. ब्रह्मा जी का हस्तक्षेप और ऐतिहासिक समझौते
ब्रह्मा जी ने पिप्पलाद को समझाया, “हे ऋषिवर! शांत हो जाइए। शनिदेव तो केवल अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं। वे कर्मों के अनुसार फल देते हैं।” पिप्पलाद का क्रोध तब भी शांत नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि एक अबोध बालक, जिसने कोई कर्म ही नहीं किया, उसे जन्म से ही दंड देना कहाँ का न्याय है?ब्रह्मा जी के समझाने पर पिप्पलाद इस शर्त पर शनिदेव को मुक्त करने के लिए तैयार हुए कि शनिदेव को जन कल्याण के लिए दो नियमों का पालन करना होगा:
5 वर्ष तक की सुरक्षा: जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तक किसी भी बालक पर शनि की महादशा या कुदृष्टि का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। क्योंकि इस आयु तक बालक निष्पाप होता है।
पीपल का संरक्षण: चूँकि पिप्पलाद का जीवन पीपल के वृक्ष ने बचाया था, इसलिए जो भी व्यक्ति सूर्योदय से पूर्व पीपल के वृक्ष को जल अर्पित करेगा या उसकी पूजा करेगा, शनिदेव उसे कभी कष्ट नहीं देंगे।
7. शनिदेव का लंगड़ापन और ‘शनैश्चर’ नाम
कहा जाता है कि पिप्पलाद मुनि ने क्रोध में शनिदेव के पैरों पर ‘ब्रह्मदण्ड’ से प्रहार किया था, जिससे शनिदेव के पैर टूट गए। इसी कारण वे धीरे-धीरे चलने लगे और उनका नाम ‘शनैश्चर’ (धीमी गति से चलने वाला) पड़ा। शनिदेव ने वचन दिया कि वे हमेशा पिप्पलाद मुनि और पीपल के वृक्ष का सम्मान करेंगे।
निष्कर्ष: पीपल पूजा का महत्व
आज भी ज्योतिष शास्त्र में शनि दोष के निवारण के लिए पीपल के वृक्ष की पूजा सबसे अचूक उपाय मानी जाती है। शनिवार के दिन पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना और उसकी परिक्रमा करना व्यक्ति को साढ़ेसाती के कष्टों से मुक्ति दिलाता है।पिप्पलाद मुनि आगे चलकर एक महान ऋषि बने और उन्होंने प्रसिद्ध ‘प्रश्न उपनिषद’ की रचना की। यह कथा हमें सिखाती है कि भक्ति और संकल्प में इतनी शक्ति होती है कि वह न्याय के विधान को भी बदल सकती है।
।। ॐ शं शनैश्चराय नमः ।। ।। जय महर्षि पिप्पलाद ।।











